ग़ज़ल
तेरा हाथ मेरे काँधे
तेरा हाथ मेरे काँधे पे दर्या बहता जाता हैकितनी खामोशी से दुख का मौसम गुजरा जाता है
नीम पे अटके चाँद की पलकें शबनम से भर जाती हैंसूने घर में रात गये जब कोई आता-जाता है
पहले ईँट, फिर दरवाजे, अब के छत की बारी हैयाद नगर में एक महल था, वो भी गिरता जाता है
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