ग़ज़ल

चंद शेर

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दोन जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये ।
ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़मींपाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है ।
जी बहुत चाहता है सच बोलेंक्या करें हौसला नहीं होता ।
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहेजब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों ।
एक दिन तुझ से मिलनें ज़रूर आऊँगाज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये ।
इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरीलोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे ।
वो ज़ाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा हैकोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे ।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने मेंतुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलानें में।
पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते ।
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था.फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला ।
मैं इतना बदमुआश नहीं यानि खुल के बैठचुभने लगी है धूप तो स्वेटर उतार दे ।
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