ग़ज़ल
गुलाबों की तरह दिल अपना
गुलाबों की तरह दिल अपना शबनम में भिगोते हैंमोहब्बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं
किसी ने जिस तरह अपने सितारों को सजाया हैग़ज़ल के रेशमी धागे में यूँ मोती पिरोते हैं
पुराने मौसमों के नामे-नामी मिटते जाते हैंकहीं पानी, कहीं शबनम, कहीं आँसू भिगोते हैं
यही अंदाज़ है मेरा समन्दर फ़तह करने कामेरी काग़ज़ की कश्ती में कई जुगनू भी होते हैं
सुना है बद्र साहब महफ़िलों की जान होते थेबहुत दिन से वो पत्थर हैं, न हँसते हैं न रोते हैं
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh