ग़ज़ल

गुलों की तरह हम ने ज़िंदगी को इस कदर जाना

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
गुलों की तरह हम ने ज़िंदगी को इस कदर जानाकिसी कि ज़ुल्फ़ में इक रात सोना और बिखर जाना
अगर ऐसे गए तो ज़िंदगी पर हर्फ़ आयेगाहवाओं से लिपटना तितलियों को चूम कर जाना
धुनक के रख दिया था बादलों को जिन परिंदों नेउन्हें किसने सिखाया अपने साये से भी डर जाना
कहाँ तक ये दिया बीमार कमरे कि फ़िज़ां बदलेकभी तुम एक मुट्ठी धुप इन ताकों में भर जाना
इसी में आफिअत है घर में अपने चैन से बैठोकिसी कि स्मित जाना हो तो रस्ते में उतर जाना
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh