ग़ज़ल
लगता नहीं है जी मेरा
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार मेंकिस की बनी है आलम-ए-बेदाद-ओ-यार में
कैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म असल में दोनों एक हैंमौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों
कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिएदो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
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