ग़ज़ल
क्यूँके हम दुनिया में आए
क्यूँके हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहींइक सबब क्या भेद वाँ का सब का सब खुलता नहीं.
पूछता है हाल भी गर वो तो मारे शर्म केग़ुंचा-ए-तस्वीर के मानिंद लब खुलता नहीं.
शाहिद-ए-मक़सूद तक पहुँचेंगे क्यूँकर देखिएबंद है बाब-ए-तमन्ना है ग़ज़ब खुलता नहीं.
बंद है जिस ख़ाना-ए-ज़िन्दाँ में दीवाना तेराउस का दरवाज़ा परी-रू रोज़ ओ शब खुलता नहीं.
दिल है ये ग़ुंचा नहीं है इस का उक़दा ऐ सबाखोलने का जब तलक आवे न ढब खुलता नहीं.
इश्क़ ने जिन को किया ख़ातिर-गिरफ़्ता उन का दिललाख होवे गरचे सामान-ए-तरब खुलता नहीं.
किस तरह मालूम होवे उस के दिल का मुद्दआमुझ से बातों में 'ज़फ़र' वो ग़ुंचा-लब खुलता नहीं.
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