ग़ज़ल

क्या कुछ न किया और हैं क्या

बहादुर शाह ज़फ़र · सब कलाम देखें
क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करतेकुछ करते हैं ऐसा ब-ख़ुदा कुछ नहीं करते.
अपने मर्ज़-ए-ग़म का हकीम और कोई हैहम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते.
मालूम नहीं हम से हिजाब उन को है कैसाऔरों से तो वो शर्म ओ हया कुछ नहीं करते.
गो करते हैं ज़ाहिर को सफ़ा अहल-ए-कुदूरतपर दिल को नहीं करते सफ़ा कुछ नहीं करते.
वो दिल-बरी अब तक मेरी कुछ करते हैं लेकिनतासीर तेरे नाले दिला कुछ नहीं करते.
दिल हम ने दिया था तुझे उम्मीद-ए-वफ़ा परतुम हम से नहीं करते वफ़ा कुछ नहीं करते.
करते हैं वो इस तरह ‘ज़फ़र’ दिल पे जफ़ाएँज़ाहिर में ये जानो के जफ़ा कुछ नहीं करते.
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