ग़ज़ल
क़ारूँ उठा के सर पे सुना
क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चलादुनिया से क्या बख़ील ब-जुज़ रंज ले चला.
मिन्नत थी बोसा-ए-लब-ए-शीरीं के दिल मेरामुझ को सोए मज़ार-ए-शकर गंज ले चला.
साक़ी सँभालता है तो जल्दी मुझे सँभालवर्ना उड़ा के पाँ नशा-ए-बंज ले चला.
दौड़ा के हाथ छाती पे हम उन की यूँ फिरेजैसे कोई चोर आ के हो नारंज ले चला.
चौसर का लुत्फ़ ये है के जिस वक़्त पो पड़ेहम बर-चहार बोले तो बर-पंज ले चला.
जिस दम ‘ज़फ़र’ ने पढ़ के ग़ज़ल हाथ से रखीआँखों पे रख हर एक सुख़न-संज ले चला.
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