ग़ज़ल

निबाह बात का उस हीला-गर

बहादुर शाह ज़फ़र · सब कलाम देखें
निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआउधर से क्या न हुआ पर इधर से कुछ न हुआ.
जवाब-ए-साफ़ तो लाता अगर न लाता ख़तलिखा नसीब का जो नामा-बर से कुछ न हुआ.
हमेशा फ़ितने ही बरपा किए मेरे सर परहुआ ये और तो उस फ़ितना-गर से कुछ न हुआ.
बला से गिर्या-ए-शब तू ही कुछ असर करताअगरचे इश्क़ में आह-ए-सहर से कुछ न हुआ.
जला जला के किया शम्मा साँ तमाम मुझेबस और तो मुझे सोज़-ए-जिगर से कुछ न हुआ.
रहीं अदू से वही गर्म-जोशियाँ उस कीइस आह-ए-सर्द और इस चश्म-ए-तर से कुछ न हुआ.
उठाया इश्क़ में क्या क्या न दर्द-ए-सर मैं नेहुसूल पर मुझे उस दर्द-ए-सर से कुछ न हुआ.
शब-ए-विसाल में भी मेरी जान को आरामअज़ीज़ो दर्द-ए-जुदाई के डर से कुछ न हुआ.
न दुँगा दिल उसे मैं ये हमेशा कहता थावो आज ले ही गया और ‘ज़फ़र’ से कुछ न हुआ.
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