ग़ज़ल

क्यूँकर न ख़ाक-सार रहें

बहादुर शाह ज़फ़र · सब कलाम देखें
क्यूँकर न ख़ाक-सार रहें अहल-ए-कीं से दूरदेखो ज़मीं फ़लक से फ़लक है ज़मीं से दूर.
परवाना वस्ल-ए-शम्मा पे देता है अपनी जाँक्यूँकर रहे दिल उस के रुख़-ए-आतिशीं से दूर.
मज़मून-ए-वस्ल-व-हिज्र जो नामे में है रक़महै हर्फ़ भी कहीं से मिले और कहीं से दूर.
गो तीर-ए-बे-गुमाँ है मेरे पास पर अभीजाए निकल के सीना-ए-चर्ख़-ए-बरीं से दूर.
वो कौन है के जाते नहीं आप जिस के पासलेकिन हमेशा भागते हो तुम हमीं से दूर.
हैरान हूँ के उस के मुक़ाबिल हो आईनाजो पुर-ग़ुरूर खिंचता है माह-ए-मुबीं से दूर.
याँ तक अदू का पास है उन को के बज़्म मेंवो बैठते भी हैं तो मेरे हम-नशीं से दूर.
मंज़ूर हो जो दीद तुझे दिल की आँख सेपहुँचे तेरी नज़र निगह-ए-दूर-बीं से दूर.
दुन्या-ए-दूँ की दे न मोहब्बत ख़ुदा ‘ज़फ़र’इन्साँ को फेंक दे है ये ईमान ओ दीं से दूर.
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