ग़ज़ल
आ गई मंज़िलें-मुराद, बांगेदरा को भूल जा
आ गई मंज़िले-मुराद, बाँगेदरा को भूल जा।ज़ाते-खु़दा में यूँ हो महव, नामे-ख़ुदा को भूल जा॥
सबकी पस्न्द अलग-अलग, सबके जुदा-जुदा मज़ाक़।जिसपै कि मर मिटा कोई, अब उस अदा को भूल जा॥
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