ग़ज़ल
नादाँ की दोस्ती में जी का ज़रर न जाना
नादाँ की दोस्ती में जी का ज़रर न जाना।इक काम कर तो बैठे, और हाय कर न जाना॥
नादानियाँ हज़ारों, दानाई इक यही है।दुनिया को कुछ न जाना और उम्र भर न जाना॥
नादानियों से अपनी आफ़त में फ़ँस गया हूँ।बेदादगर को मैंने बेदादगर न जाना॥
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