ग़ज़ल
आके क़ासिद ने कहा जो, वही अक्सर निकला
आके क़ासिद ने कहा जो, वही अकसर निकला।नामाबर समझे थे हम, वह तो पयम्बर निकला॥
बाएगु़रबत कि हुई जिसके लिए खाना-खराब।सुनके आवाज़ भी घर से न वह बाहर निकला॥
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