ग़ज़ल
बन्दा नवाज़ियों पे खु़दा-ए-करीम था
बन्दा-नवाज़ियों पे ख़ुदा-ए-करीम थाकरता न मैं गुनाह तो गुनाह-ए-अज़ीम था
बातें भी की ख़ुदा ने दिखाया जमाल भीवल्लाह क्या नसीब जनाब-ए-कलीम था
दुनिया का हाल अहल-ए-अदम है ये मुख़्तसरइक दो क़दम का कूच-ए-उम्मीद-ओ-बीम था
करता मैं दर्दमन्द तबीबों से क्या रजूजिस ने दिया था दर्द बड़ा वो हक़ीम था
समाँ-ए-उफ़्व क्या मैं कहूँ मुख़्तसर है येबन्दा गुनाहगार था ख़ालिक़ करीम था
जिस दिन से मैं चमन में हुआ ख़्वाहे-ए-गुल 'अमीर'नाम-ए-सबा कहीं न निशान-ए-नसीम था
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.