ग़ज़ल
सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्तानिकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता
जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दाहया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता
शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दोकभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता
सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतनादबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता
हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतनाइधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता
वो बेदर्दी से सर काटे 'अमीर' और मैं कहूँ उन सेहुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता
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