ग़ज़ल

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझको रात भर रक्खा

अमीर मीनाई · सब कलाम देखें
फ़िराक़-ए-यारने बेचैन मुझको रात भर रक्खाकभी तकियाइधर रक्खा, कभी तकिया उधर रक्खा
बराबरआईने के भी न समझे क़द्रवो दिल कीइसे ज़ेरे-क़दमरक्खा उसे पेशे-नज़ररक्खा
तुम्हारे संगे-दरका एक टुकड़ा भी जो हाथ आयाअज़ीज़ऐसा किया मर कर उसे छाती पे धर रक्खा
जिनाँ में साथ अपने क्यों न ले जाऊँ मैं नासेहकोसुलूकऐसा ही मेरे साथ है हज़रतने कर रक्खा
बड़ा एहसाँ है मेरे सर पे उसकी लग़ज़िश-ए-पाकाकि उसने बेतहाशा हाथ मेरे दोशपर रक्खा
तेरे हर नक़्श-ए-पाको रहगुज़र में सजदा कर बैठेजहाँ तूने क़दम रक्खा वहाँ हमने भी सर रक्खा
अमीर अच्छा शगून-ए-मय किया साक़ी की फ़ुरक़तमेंजो बरसा अब्र-ए-रहमतजा-ए-मयशीशेमें भर रक्खा
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