ग़ज़ल
है दिल को शौक़ उस बुत-ए-क़ातिल की दीद का
है दिल को शौक़ उस बुत-ए-क़ातिल की दीद काहोली का रंग जिस को लहू है शहीद का
दुनिया परस्त क्या रहे उक़बा करेंगे तैनिकलेगा ख़ाक घर से क़दम ज़न मुरीद का
होने न पाए ग़ैर बग़लगीर यार सेअल्लाह यूँ ही रोज़ गुज़र जाए ईद का
सारा हिसाब ख़त्म हुआ हश्र हो चुकापूछा गया न हाल तुम्हारे शहीद का
जा के सफ़र में भूल गए हमको वो अमीरयाँ और दोस्तों ने लिखा ख़त रसीद का
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