ग़ज़ल
फ़रिश्ते से बेहतर है इन्सान बनना
बढ़ाओ न आपस में मिल्लत ज़ियादामुबादा कि हो जाए नफ़रत ज़ियादा
तक़ल्लुफ़ अलामत है बेग़ानगी कीन डालो तक़ल्लुफ़ की आदत ज़ियादा
करो दोस्तो पहले आप अपनी इज़्ज़तजो चाहो करें लोग इज़्ज़त ज़ियादा
निकालो न रख़ने नसब में किसी केनहीं कोई इससे रज़ालत ज़ियादा
करो इल्म से इक़्तसाबे-शराफ़तनसाबत से है ये शराफ़त ज़ियादा
फ़राग़त से दुनिया में दम भर न बैठोअगर चाहते हो फ़राग़त ज़ियादा
जहाँ राम होता है मीठी ज़बाँ सेनहीं लगती कुछ इसमें मेहनत ज़ियादा
मुसीबत का इक इक से अहवाल कहनामुसीबत से है ये मुसीबत ज़ियादा
फिर औरों की तकते फिरोगे सख़ावतबढ़ाओ न हद से सख़ावत ज़ियादा
कहीं दोस्त तुमसे न हो जाएँ बदज़नजताओ न अपनी महब्बत ज़ियादा
जो चाको फ़क़ीरी में इज़्ज़त से रहनान रक्खो अमीरों से मिल्लत ज़ियादा
है उल्फ़त भी वहशत भी दुनिया से लाज़िमपै उल्फ़त ज़ियादा न वहशत ज़ियादा
फ़रिश्ते से बेहतर है इन्सान बननामगर इसमें पढ़ती है मेहनत ज़ियादा
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.