ग़ज़ल

इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद

अल्ताफ़ हुसैन हाली · सब कलाम देखें
इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायदख़ुद-ब-ख़ुद, दिल में है इक शख़्स समाया जाता
शब को ज़ाहिद से न मुठभेड़ हुई ख़ूब हुआनश्अ ज़ोरों पे था शायद न छुपाया जाता
लोग क्यों शेख़ को कहते हैं कि अय्यार है वोउसकी सूरत से तो ऐसा नहीं पाया जाता
अब तो तफ़क़ीर, से वाइज़, ! नहीं हटता ‘हाली’कहते पहले तो दे-ले के हटाया जाता
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