ग़ज़ल
धूम है अपनी पारसाई की
धूम थी अपनी पारसाई कीकी भी और किससे आश्नाई की
क्यों बढ़ाते हो इख़्तलात बहुतहमको ताक़त नहीं जुदाई की
मुँह कहाँ तक छुपाओगे हमसेतुमको आदत है ख़ुदनुमाई की
न मिला कोई ग़ारते-ईमाँरह गई शर्म पारसाई की
मौत की तरह जिससे डरते थेसाअत आ पहुँची उस जुदाई की
ज़िंदा फिरने की हवस है ‘हाली’इन्तहा है ये बेहयाई की
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