ग़ज़ल कखन हरब दुख मोर विद्यापति · सब कलाम देखें हिन्दी रोमन कखन हरब दुख मोर, हे भोलानाथ।दुखहि जनम भेल, दुखहि जिवन गेल, सपनहु नहि सुख मोर।एहि भव सागर थाह कतहु नहि, भैरव धरु करुआर।भन विद्यापति मोर भोलानाथ गति करब अन्त मोहि पार। पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh