ग़ज़ल

कान्ह हेरल छल मन बड़ साध

विद्यापति · सब कलाम देखें
कान्ह हेरल छल मन बड़ साध।कान्ह हेरइत भेलएत परमाद।।तबधरि अबुधि सुगुधि हो नारि।कि कहि कि सुनि किछु बुझय न पारि।।साओन घन सभ झर दु नयान।अविरल धक-धक करय परान।।की लागि सजनी दरसन भेल।रभसें अपन जिब पर हाथ देल।।न जानिअ किए करु मोहन चारे।हेरइत जिब हरि लय गेल मारे।।एत सब आदर गेल दरसाय।जत बिसरिअ तत बिसरि न जाय।।विद्यापति कह सुनु बर नारि।धैरज धरु चित मिलब मुरारि।।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh