ग़ज़ल
अम्बर बदन झपाबह गोरि
अम्बर बदन झपाबह गोरि।राज सुनइ छिअ चांदक चोरि।।घरे घरे पहरु गेल अछ जोहि।अब ही दूखन लागत तोहि।।कतय नुकायब चांदक चोरि।जतहि नुकायब ततहि उजोरि।।हास सुधारस न कर उजोर।बनिक धनिक धन बोलब मोर।।अधर समीप दसन कर जोति।सिंदुर सीम बैसाउलि मोति।।भनइ विद्यापति होहु निसंक।चांदुह कां किछु लागु कलंक।।
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