ग़ज़ल
ए धनि माननि करह संजात
ए धनि माननि करह संजात।तुअ कुच हेमघाट हार भुजंगिनी ताक उपर धरु हाथ।।तोंहे छाडि जदि हम परसब कोय। तुअ हार-नागिनि कारब माथे।।हमर बचन यदि नहि परतीत। बुझि करह साति जे होय उचीत।।भुज पास बांधि जघन तले तारि। पयोधर पाथर अदेह मारि।।उप कारा बांधि राखह दिन-राति। विद्यापति कह उचित ई शादी।।
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