ग़ज़ल
आदरे अधिक काज नहि बन्ध
आदरे अधिक काज नहि बन्ध।माधव बुझल तोहर अनुबन्ध।।आसा राखह नयन पठाए।कत खन कउसलें कपट नुकाए।।चल चल माधव तोहें जे सयान।ताके बोलिअ जे उचिज न जान।।कसिअ कसउटी चिन्हिअ हेम।प्रकृति परेखिअ सुपुरूख पेम।।सउरभें जानिअ कमल पराग।नयने निवेदिअ नव अनुराग।।भनइ विद्यापति नयनक लाज।आदरें जानिअ आगिल काज।।
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