ग़ज़ल

अनुभूति

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
तुम आती हो,नव अंगों काशाश्वत मधु-विभव लुटाती हो।
बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम,सांसों में थमता स्पंदन-क्रम,तुम आती हो,अंतस्थल मेंशोभा ज्वाला लिपटाती हो।
अपलक रह जाते मनोनयनकह पाते मर्म-कथा न वचन,तुम आती हो,तंद्रिल मन मेंस्वप्नों के मुकुल खिलाती हो।
अभिमान अश्रु बनता झर-झर,अवसाद मुखर रस का निर्झर,तुम आती हो,आनंद-शिखरप्राणों में ज्वार उठाती हो।
स्वर्णिम प्रकाश में गलता तम,स्वर्गिक प्रतीति में ढलता श्रमतुम आती हो,जीवन-पथ परसौंदर्य-रहस बरसाती हो।
जगता छाया-वन में मर्मर,कंप उठती रुध्द स्पृहा थर-थर,तुम आती हो,उर तंत्री मेंस्वर मधुर व्यथा भर जाती हो।
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