ग़ज़ल

धरती का आँगन इठलाता

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
धरती का आँगन इठलाता!शस्य श्यामला भू का यौवनअंतरिक्ष का हृदय लुभाता!
जौ गेहूँ की स्वर्णिम बालीभू का अंचल वैभवशालीइस अंचल से चिर अनादि सेअंतरंग मानव का नाता!
आओ नए बीज हम बोएंविगत युगों के बंधन खोएंभारत की आत्मा का गौरवस्वर्ग लोग में भी न समाता!
भारत जन रे धरती की निधि,न्यौछावर उन पर सहृदय विधि,दाता वे, सर्वस्व दान करउनका अंतर नहीं अघाता!
किया उन्होंने त्याग तप वरण,जन स्वभाव का स्नेह संचरणआस्था ईश्वर के प्रति अक्षयश्रम ही उनका भाग्य विधाता!
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