ग़ज़ल
द्वाभा के एकाकी प्रेमी
द्वाभा के एकाकी प्रेमी,नीरव दिगन्त के शब्द मौन,रवि के जाते, स्थल पर आतेकहते तुम तम से चमक--कौन?::सन्ध्या के सोने के नभ पर::तुम उज्ज्वल हीरक सदृश जड़े,::उदयाचल पर दीखते प्रात::अंगूठे के बल हुए खड़े!अब सूनी दिशि औ’ श्रान्त वायु,कुम्हलाई पंकज-कली सृष्टि;तुम डाल विश्व पर करुण-प्रभाअविराम कर रहे प्रेम-वृष्टि!::ओ छोटे शशि, चाँदी के उडु!::जब जब फैले तम का विनाश,::तुम दिव्य-दूत से उतर शीघ्र::बरसाओ निज स्वर्गिक प्रकाश!
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