ग़ज़ल

घंटा

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
नभ की है उस नीली चुप्पी परघंटा है एक टंगा सुन्दर,जो घडी घडी मन के भीतरकुछ कहता रहता बज बज कर।परियों के बच्चों से प्रियतर,फैला कोमल ध्वनियों के परकानों के भीतर उतर उतरघोंसला बनाते उसके स्वर।भरते वे मन में मधुर रोर"जागो रे जागो, काम चोर!डूबे प्रकाश में दिशा छोरअब हुआ भोर, अब हुआ भोर!""आई सोने की नई प्रातकुछ नया काम हो, नई बात,तुम रहो स्वच्छ मन, स्वच्छ गात,निद्रा छोडो, रे गई, रात!
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