ग़ज़ल

अमर स्पर्श

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
खिल उठा हृदय,पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!
खुल गए साधना के बंधन,संगीत बना, उर का रोदन,अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।
क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
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