ग़ज़ल अमर स्पर्श सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें हिन्दी रोमन खिल उठा हृदय,पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!खुल गए साधना के बंधन,संगीत बना, उर का रोदन,अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।क्यों रहे न जीवन में सुख दुख पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh