ग़ज़ल

तप रे!

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
तप रे, मधुर मन!
विश्व-वेदना में तप प्रतिपल,जग-जीवन की ज्वाला में गल,बन अकलुष, उज्जवल औ\' कोमलतप रे, विधुर-विधुर मन!
अपने सजल-स्वर्ण से पावनरच जीवन की पूर्ति पूर्णतमस्थापित कर जग अपनापन,ढल रे, ढल आतुर मन!
तेरी मधुर मुक्ति ही बन्धन,गंध-हीन तू गंध-युक्त बन,निज अरूप में भर स्वरूप, मनमूर्तिमान बन निर्धन!गल रे, गल निष्ठुर मन!
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