ग़ज़ल
कवि किसान
जोतो हे कवि, निज प्रतिभा के:फल से निष्ठुर मानव अंतर,चिर जीर्ण विगत की खाद डाल:जन-भूमि बनाओ सम सुंदर।
बोओ, फिर जन मन में बोओ,:तुम ज्योति पंख नव बीज अमर,जग जीवन के अंकुर हँस हँस:भू को हरीतिमा से दें भर।पृथ्वी से खोद निराओ, कवि,:मिथ्या विश्वासों के तृण खर,सींचो अमृतोपम वाणी की:धारा से मन, भव हो उर्वर।
नव मानवता का स्वर्ण-शस्य-:सौन्दर्य लवाओ जन-सुखकर,तुम जग गृहिणी, जीवन किसान,:जन हित भंडार भरो निर्भर।
रचनाकाल: जनवरी’ ४०
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