ग़ज़ल
गंगा
अब आधा जल निश्चल, पीला,--आधा जल चंचल औ’, नीला--:गीले तन पर मृदु संध्यातपसिमटा रेशम पट सा ढीला।... ... ... ...ऐसे सोने के साँझ प्रात,ऐसे चाँदी के दिवस रात,:ले जाती बहा कहाँ गंगाजीवन के युग क्षण,-- किसे ज्ञात!
विश्रुत हिम पर्वत से निर्गत,किरणोज्वल चल कल ऊर्मि निरत,:यमुना, गोमती आदी से मिलहोती यह सागर में परिणत।
यह भौगोलिक गंगा परिचित,जिसके तट पर बहु नगर प्रथित,:इस जड़ गंगा से मिली हुईजन गंगा एक और जीवित!
वह विष्णुपदी, शिव मौलि स्रुता,वह भीष्म प्रसू औ’ जह्नु सुता,:वह देव निम्नगा, स्वर्गंगा,वह सगर पुत्र तारिणी श्रुता।
वह गंगा, यह केवल छाया,वह लोक चेतना, यह माया,:वह आत्म वाहिनी ज्योति सरी,यह भू पतिता, कंचुक काया।
वह गंगा जन मन से नि:सृत,जिसमें बहु बुदबुद युग नर्तित,:वह आज तरंगित, संसृति केमृत सैकत को करने प्लावित।
दिशि दिशि का जन मत वाहित कर,वह बनी अकूल अतल सागर,:भर देगी दिशि पल पुलिनों मेंवह नव नव जीवन की मृद् उर्वर!... ... ... ... ...अब नभ पर रेखा शशि शोभित,गंगा का जल श्यामल, कम्पित,:लहरों पर चाँदी की किरणेंकरतीं प्रकाशमय कुछ अंकित!
रचनाकाल: फ़रवरी’ ४०
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