ग़ज़ल
अनोखा दान
अपने बिखरे भावों का मैंगूँथ अटपटा सा यह हार।चली चढ़ाने उन चरणों पर,अपने हिय का संचित प्यार॥
डर था कहीं उपस्थिति मेरी,उनकी कुछ घड़ियाँ बहुमूल्यनष्ट न कर दे, फिर क्या होगामेरे इन भावों का मूल्य?
संकोचों में डूबी मैं जबपहुँची उनके आँगन मेंकहीं उपेक्षा करें न मेरी,अकुलाई सी थी मन में।
किंतु अरे यह क्या,इतना आदर, इतनी करुणा, सम्मान?प्रथम दृष्टि में ही दे डालातुमने मुझे अहो मतिमान!
मैं अपने झीने आँचल मेंइस अपार करुणा का भारकैसे भला सँभाल सकूँगीउनका वह स्नेह अपार।
लख महानता उनकी पल-पलदेख रही हूँ अपनी ओरमेरे लिए बहुत थी केवलउनकी तो करुणा की कोर।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.