ग़ज़ल

व्याकुल चाह

सुभद्रा कुमारी चौहान · सब कलाम देखें
सोया था संयोग उसेकिस लिए जगाने आए हो?क्या मेरे अधीर यौवन कीप्यास बुझाने आए हो??
रहने दो, रहने दो, फिर सेजाग उठेगा वह अनुराग।बूँद-बूँद से बुझ न सकेगी,जगी हुई जीवन की आग॥
झपकी-सी ले रहीनिराशा के पलनों में व्याकुल चाह।पल-पल विजन डुलाती उस परअकुलाए प्राणों की आह॥
रहने दो अब उसे न छेड़ो,दया करो मेरे बेपीर!उसे जगाकर क्यों करते हो?नाहक मेरे प्राण अधीर॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.