ग़ज़ल

झाँसी की रानी की समाधि पर

सुभद्रा कुमारी चौहान · सब कलाम देखें
इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||
यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |
बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||
इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||
बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||
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