ग़ज़ल

जीवन-फूल

सुभद्रा कुमारी चौहान · सब कलाम देखें
मेरे भोले मूर्ख हृदय नेकभी न इस पर किया विचार।विधि ने लिखी भाल पर मेरेसुख की घड़ियाँ दो ही चार॥
छलती रही सदा हीमृगतृष्णा सी आशा मतवाली।सदा लुभाया जीवन साकी नेदिखला रीती प्याली॥
मेरी कलित कामनाओं कीललित लालसाओं की धूल।आँखों के आगे उड़-उड़ करती हैव्यथित हृदय में शूल॥
उन चरणों की भक्ति-भावनामेरे लिए हुई अपराध।कभी न पूरी हुई अभागेजीवन की भोली सी साध॥
मेरी एक-एक अभिलाषाका कैसा ह्रास हुआ।मेरे प्रखर पवित्र प्रेम काकिस प्रकार उपहास हुआ॥
मुझे न दुख हैजो कुछ होता हो उसको हो जाने दो।निठुर निराशा के झोंकों कोमनमानी कर जाने दो॥
हे विधि इतनी दया दिखानामेरी इच्छा के अनुकूल।उनके ही चरणों परबिखरा देना मेरा जीवन-फूल॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.