ग़ज़ल
मधुमय प्याली
रीती होती जाती थीजीवन की मधुमय प्याली।फीकी पड़ती जाती थीमेरे यौवन की लाली।।
हँस-हँस कर यहाँ निराशाथी अपने खेल दिखाती।धुंधली रेखा आशा कीपैरों से मसल मिटाती।।
युग-युग-सी बीत रही थींमेरे जीवन की घड़ियाँ।सुलझाये नहीं सुलझतीउलझे भावों की लड़ियाँ।
जाने इस समय कहाँ सेये चुपके-चुपके आए।सब रोम-रोम में मेरेये बन कर प्राण समाए।
मैं उन्हें भूलने जातीये पलकों में छिपे रहते।मैं दूर भागती उनसेये छाया बन कर रहते।
विधु के प्रकाश में जैसेतारावलियाँ घुल जातीं।वालारुण की आभा सेअगणित कलियाँ खुल जातीं।।
आओ हम उसी तरह सेसब भेद भूल कर अपना।मिल जाएँ मधु बरसायेंजीवन दो दिन का सपना।।
फिर छलक उठी है मेरेजीवन की मधुमय प्याली।आलोक प्राप्त कर उनकाचमकी यौवन की लाली।।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.