ग़ज़ल
विदा
अपने काले अवगुंठन कोरजनी आज हटाना मत।जला चुकी हो नभ में जोये दीपक इन्हें बुझाना मत॥
सजनि! विश्व में आजतना रहने देना यह तिमिर वितान।ऊषा के उज्ज्वल अंचल मेंआज न छिपना अरी सुजान॥
सखि! प्रभात की लाली मेंछिन जाएगी मेरी लाली।इसीलिए कस कर लपेट लो,तुम अपनी चादर काली॥
किसी तरह भी रोको, रोको,सखि! मुझ निधनी के धन को।आह! रो रहा रोम-रोमफिर कैसे समझाऊँ मन को॥
आओ आज विकलते!जग की पीड़ाएं न्यारी-न्यारी।मेरे आकुल प्राण जला दो,आओ तुम बारी-बारी॥
ज्योति नष्ट कर दो नैनों की,लख न सकूँ उनका जाना।फिर मेरे निष्ठुर से कहना,कर लें वे भी मनमाना॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.