ग़ज़ल

झिलमिल तारे

सुभद्रा कुमारी चौहान · सब कलाम देखें
कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैंझिलमिल-झिलमिल तारे?धीमे प्रकाश में कैसे तुमचमक रहे मन मारे।।
अपलक आँखों से कह दोकिस ओर निहारा करते?किस प्रेयसि पर तुम अपनीमुक्तावलि वारा करते?
करते हो अमिट प्रतीक्षा,तुम कभी न विचलित होते।नीरव रजनी अंचल मेंतुम कभी न छिप कर सोते।।
जब निशा प्रिया से मिलने,दिनकर निवेश में जाते।नभ के सूने आँगन मेंतुम धीरे-धीरे आते।।
विधुरा से कह दो मन की,लज्जा की जाली खोलो।क्या तुम भी विरह विकल हो,हे तारे कुछ तो बोलो।
मैं भी वियोगिनी मुझसेफिर कैसी लज्जा प्यारे?कह दो अपनी बीती कोहे झिलमिल-झिलमिल तारे!
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.