ग़ज़ल
चलते समय
तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!’जा...’ कहते रुकती है जबानकिस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!
सेवा करना था जहाँ मुझेकुछ भक्ति-भाव दरसाना था।उन कृपा-कटाक्षों का बदलाबलि होकर जहाँ चुकाना था॥
मैं सदा रूठती ही आई,प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना।वह मान बाण-सा चुभता है,अब देख तुम्हारा यह जाना॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.