ग़ज़ल

एक बूँद

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
"मैं हूँ कृपण कहाँ आई तूले कर जीवन भर की प्यास?दे सकता हूँ एक बूँद मैं,जा तू अन्य धनी के पास।"
"बस बस, एक बूँद ही दे दे!"कहा तृषार्ता ने खिलकर-"किसके पास, कहाँ जाऊँ अबतुझ-से दानी से मिलकर?
सिक्ता की कंटक शैय्या परइसी बूँद की आशा मेंआतप के पंचाग्नि ताप सेडिगी नहीं हूँ मैं तिल भर।
मेरे पुलक-स्वाति के घन हे।पूरा कर मेरा अभिलाष;अधिक नहीं, बस, इस सीपी कोएक बूँद की ही है प्यास।"
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.