ग़ज़ल

आह्लाद

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
आज पड़ती है जहाँ मेरी दृष्टिपाती वहीं नूतन रहस्य सृष्टिमेरे कान,सुनते हैं जो कुछ समस्त वह स्वगीय गान।मेरे प्राणजो कुछ है चारो ओर, -जिसका न ओर छोर-हो गये उसी में हैं विलीयमान।मेरा आज,आज चिरकाल में रहा विराज।मेरे अरे ओ अनंत,मुझको बता दे, कहाँ अंतर्हित तेरा अंत।
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