ग़ज़ल
घनाह्लाद
पावस का यह घनघटापुंजकर स्निग्ध धरा का नव निकुंजबरसा बरसा कर सुरसधारकरता है नभतल में विहार।
भरकर नव मौक्तिकबिन्दु मालवसुधा का यह अंचल विशालआनंद विकम्पित है अधीर;क्रीड़ारत है सुरभित समीर।
नव-सूर्य-करोज्ज्वल, रजतगात,झरझर कर यह निर्झर प्रपातकर उथलित प्रचुर प्रमोदपानकरता है कलकल-कलित गान।
रह रह कर यह पिक बार-बारकर रहा मधुरिमा का प्रसारहै हरित धरा का हेमगात्रभर ओतप्रोत प्रमोदपात्र।
उस प्रमद पात्र का सुरस धन्यहै छलक रहा अनुपम अन्य।पर इस उर में यह घनाह्लादधारण कर लेता है विषाद।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.