ग़ज़ल
अनौचित्य
यह कृषि कितनों की अन्नदा प्राण-दात्री,अहह घन! तुम्हारी है रही प्रेम-पात्री।जलधर, तुमने ही तो इसे था बढाया,फिर उपल गिरा के क्यों स्वयं ही मिटाया।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.