ग़ज़ल

कामना

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
हाय! तुम्हारे क्रीड़ा-स्थल इसमानस में हे हृदयाधार,विपुल वासनाओं के पत्थरफेंक रहे हम बारंबार।
उलटी हमें हानि ही होती,यद्यपि इस अपनी कृति सेकिंतु इसी में लगे हुए हैंयथाशक्ति हम सभी प्रकार।
जो जल स्वच्छ और निर्मल थापंकिल होता जाता है,घटता ही जाता है प्रति पलउसका वह गाम्भीर्य अपार।
छिपा हुआ है पद्मासन जोयहीं तुम्हारे लिये कहीं,उसके उपर चोट न आवेयही विनय है करुणागार।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.