ग़ज़ल
कृतघ्न
इन विटपवरों ने हे मरूत् ! मोदकरी,सुरभि सतत देके की सु-सेवा तुम्हारी!व्यथित अब इन्हीं के वह्नि से आज देखज्वलित कर रहे हो और भी क्यों विशेष।
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