ग़ज़ल
केतो करौ कोई,पैए करम लिखोई ताते
केतो करौ कोई,पैए करम लिखोई, ताते,दूसरी न होई,उर सोई ठहराईए.आधी ते सरस बीति गई बरस,अबदुर्जन दरस बीच रस न बढाईए.चिंता अनुचित, धरु धीरज उचित,सेनापति ह्वै सुचित रघुपति गुनगाईए.चारि बर दानि तजि पायँ कमलेच्छन के,पायक मलेच्छन के कहे को कहलाईए.
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh