ग़ज़ल

बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि

सेनापति · सब कलाम देखें
बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि,ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं।तपति धरनि, जग जरत झरनि, सीरीछाँह कौं पकरि, पंथी-पंछी बिरमत हैं॥'सेनापति नैक, दुपहरी के ढरत, होतघमका बिषम, ज्यौं न पात खरकत हैं।मेरे जान पौनों, सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं,घरी एक बैठि, कँ घामै बितवत हैं।
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