ग़ज़ल

तुम करतार, जन-रच्छा के करनहार

सेनापति · सब कलाम देखें
तुम करतार, जन-रच्छा के करनहार,पुजवनहार मनोरथ चित चाहे के।यह जिय जानि 'सेनापति है सरन आयो,ुजिये सरन, महा पाप-ताप दाहे के॥जो को कहौ, कि तेरे करम न तैसे, हमगाहक हैं सुकृति, भगति-रस-लाहे के।आपने करम करि, हौं ही निबहौंगो तोपै,हौं ही करतार, करतार तुम काहे के॥
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